पंजाब के मुख्यमंत्री ओएसडी घुम्मन की सीबीआई के खिलाफ अवमानना की याचिका खारिज

चंडीगढ़ में सीबीआई अदालत के एक विशेष न्यायाधीश ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) राजबीर सिंह घुमान की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में उनके और अन्य के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को कथित रूप से लीक करने के लिए सीबीआई की पूरी टीम के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही की मांग की गई थी।

सीबीआई अदालत के समक्ष अपनी याचिका में घुम्मन ने दावा किया कि सीबीआई ने प्राथमिकी को ऑनलाइन अपलोड करने से रोकने के लिए अदालत से आदेश प्राप्त किया था, लेकिन कथित तौर पर उनकी छवि खराब करने के लिए दस्तावेज मीडिया और जनता के लिए उपलब्ध कराए गए थे।

सीबीआई ने मामले की संवेदनशील प्रकृति का हवाला देते हुए प्राथमिकी अपलोड करने से छूट मांगी थी। घुम्मन के वकील ने दलील दी कि मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए।

आवेदन का विरोध करते हुए, सीबीआई के लोक अभियोजक नरेंद्र सिंह ने तर्क दिया कि 6 अक्टूबर, 2026 को दोपहर लगभग 2:25 बजे, जांच अधिकारी (आईओ) ने जांच के उस चरण में सीबीआई की वेबसाइट पर अपलोड करने से छूट की मांग करते हुए एक आवेदन के साथ अदालत में प्राथमिकी प्रस्तुत की थी।

आवेदन में कहा गया है कि प्राथमिकी में उल्लिखित आरोपियों की पहचान और अन्य विवरणों का खुलासा करने से सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है और निष्पक्ष और प्रभावी जांच पर पूर्वाग्रह हो सकता है।

जांच अधिकारी द्वारा 6 अक्टूबर, 2026 को अदालत के समक्ष एक अन्य आवेदन भी दायर किया गया था, जिसमें जांच के हिस्से के रूप में तलाशी लेने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 96 के तहत तलाशी वारंट की मांग की गई थी।

लोक अभियोजक ने प्रस्तुत किया कि चूंकि तलाशी अभी तक नहीं की गई है, इसलिए एफआईआर की सामग्री का खुलासा करने से आरोपी सतर्क हो सकते हैं, जो अन्यथा सबूतों के साथ छेड़छाड़ या नष्ट कर सकते हैं। इसलिए, सीबीआई ने जांच के उस चरण में प्राथमिकी अपलोड करने से छूट की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत ने निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और सबूतों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए छूट दी। सर्च वारंट जारी होने के बाद, सीबीआई टीमों ने चल रही जांच के हिस्से के रूप में 6 अक्टूबर, 2026 को 11 स्थानों पर तलाशी ली।

सीबीआई ने तर्क दिया कि जांच के दौरान आरोपियों की पहचान और स्थानों के बारे में विवरण सार्वजनिक हो गया और विभिन्न मीडिया मंचों पर व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया।

तलाशी के बाद 7 अक्टूबर, 2026 को एफआईआर अपलोड की गई थी। सीबीआई ने कहा कि यह कार्रवाई अदालत की अवमानना नहीं है और यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भावना के अनुरूप है।

अभियोजन पक्ष ने आगे तर्क दिया कि एफआईआर के गोपनीय रूप से या बिना अनुमति के लीक होने का सवाल ही नहीं उठता और इसके परिणामस्वरूप, अदालत की अवमानना का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसमें कहा गया है कि एफआईआर को तलाशी पूरी होने के बाद ही अपलोड किया गया था, जब इसे रोकने का उद्देश्य पूरा हो गया था।

दलीलें सुनने के बाद सीबीआई कोर्ट ने घुमान की अर्जी खारिज कर दी।

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