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परीक्षा में अनियमितताओं से संबंधित सीबीआई के करीब 158 मामले अदालतों में सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं

सूत्रों ने बताया कि सीबीआई जांच पूरी होने के बावजूद देश की विभिन्न अदालतों में कथित भर्ती परीक्षा अनियमितताओं से जुड़े करीब 158 मामलों की सुनवाई शुरू होने का इंतजार है।

अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने इन लंबित मामलों को फास्ट ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित करने के लिए सभी उच्च न्यायालयों से संपर्क करने का फैसला किया है, जो नए एंटी-पेपर लीक कानून के तहत मामलों को निपटाने के लिए विभिन्न राज्यों में स्थापित की जा रही हैं।

सूत्रों ने कहा कि सीबीआई ने उच्च न्यायालयों को यह बताने का फैसला किया है कि वह इन मुकदमे को करने के लिए समर्पित विशेष अभियोजक मुहैया कराएगी और सभी संभव संसाधन उपलब्ध कराएगी ताकि उन्हें जल्द से जल्द पूरा किया जा सके।

राष्ट्रीय राजधानी में 2000 के बाद से करीब 25 मामले ऐसे हैं जो सीबीआई जांच पूरी होने के बावजूद मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें 2010-11 की एम्स पीजी भर्ती परीक्षा, 2011 की दिल्ली यूनिवर्सिटी मेडिकल एंड डेंटल एंट्रेंस, 2004 की कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) अनियमितताएं, 2013 की एसएससी (कर्मचारी चयन आयोग) भर्ती और शिक्षकों की भर्ती शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार में 2003 और 2011 के पीएमटी (प्री-मेडिकल टेस्ट) में अनियमितताओं के अलावा नीट 2024 के कथित पेपर लीक से संबंधित तीन मामले सहित पांच मामले लंबित हैं।

हिमाचल प्रदेश में, 2022 का कांस्टेबल भर्ती मामला उन तीन मामलों में से एक है जो सुनवाई शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि जम्मू-कश्मीर में तीन मामलों की सुनवाई चल रही है, जिनमें जूनियर इंजीनियर और कांस्टेबल भर्ती में अनियमितताएं शामिल हैं।

इसी तरह, झारखंड में पांच मामले मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे हैं; कर्नाटक में पांच; महाराष्ट्र में तीन, जिसमें नीट 2024 से संबंधित दो मामले शामिल हैं; राजस्थान में आठ; तमिलनाडु में 14; और पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में 10-10 मामले सामने आए हैं।

सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि लंबे समय तक देरी सफल अभियोजन की संभावना को गंभीर रूप से नष्ट कर देती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे साल बीतते हैं, गवाह बुजुर्ग या अनुपलब्ध होते जाते हैं, यादें फीकी पड़ जाती हैं, आरोपी की पहचान करना मुश्किल होता जाता है और गवाही अक्सर बदल जाती है।

जांच अधिकारियों, अभियोजकों और यहां तक कि पीठासीन न्यायाधीशों के बार-बार तबादले कार्यवाही को और जटिल बनाते हैं, जिससे यह जोखिम बढ़ जाता है कि देश के कुछ परीक्षा धोखाधड़ी अभियोजन अंततः ढह सकते हैं।

हाल ही में संसद द्वारा पारित सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 में प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट-ट्रैक न्यायालय के रूप में नामित करने का प्रावधान है।

कानून में इन फास्ट ट्रैक अदालतों को बिना अनावश्यक ब्रेक के दिन-प्रतिदिन मामलों की सुनवाई करने, आरोप पत्र दायर होने के तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने और अन्य अदालतों में पहले से लंबित मामलों को इन नए विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालयों में स्थानांतरित करने का प्रावधान है, जिन्हें स्थानांतरण के तीन महीने के भीतर पूरा किया जाना है।

प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इन मामलों पर बहस करने के लिए समर्पित विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति भी करेगा।

हाल ही में एक सरकारी बयान में कहा गया था, ‘अगर किसी आरोपी को भारतीय न्याय संहिता या किसी अन्य कानून के तहत अन्य संबंधित आरोपों का सामना करना पड़ता है, तो विशेष फास्ट ट्रैक अदालत मामले को कई अदालतों में भेजने के बजाय एक ही मुकदमे में उन आरोपों की सुनवाई करेगी.’

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