उज्जैन में ‘खड़े हनुमान’ की थाह पाना विज्ञान के लिए भी आसान नहीं, तकनीकी पड़ताल में हैं कई चुनौतियां; जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

पावन नगरी उज्जैन में छत्री चौक के समीप स्थित खड़े हनुमान मंदिर की मूर्ति के सुरक्षित विस्थापन के लिए प्रशासन विशेषज्ञों की मदद ले रहा है। मुख्य चुनौती मूर्ति की नींव की गहराई और जमीन के नीचे की संरचना का पता लगाने की है। इसके बाद ही आगे का निर्णय लिया जा सकेगा।
उल्लेखनीय है कि सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों के तहत कंठाल-छत्रीचौक मार्ग चौड़ीकरण की जद में आ रहे खड़े हनुमान मंदिर का ढांचा 4 सितंबर को गिरा दिया गया था। हालांकि मूर्ति विस्थापित नहीं हो पाई है। भक्तों का कहना है कि हनुमान जी यहीं रहना चाहते हैं। इसलिए प्रशासन को विस्थापना का विचार छोड़ देना चाहिए।
वहीं कई आस्थावान कह रहे हैं कि विस्थापना में मूर्ति को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं आनी चाहिए। लोगों की आस्था को देखते हुए प्रशासन ने विशेषज्ञों से मूर्ति की जांच और इसके तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं के अनुसंधान के बाद ही आगे का निर्णय लेना तय किया है।
शिलाखंड से जुड़ी हो सकती है मूर्ति
शासकीय होलकर विज्ञान महाविद्यालय, इंदौर के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर शैलेष चौरे ने बताया कि प्राचीन काल में भूमि के काफी नीचे से ऊपर की ओर उठी शिलाखंडों को तराशकर मूर्तियां बना दी जाती थीं। खड़े हनुमान की मूर्ति देखकर यह एक संभावना लगती है।
ऐसे में विस्थापन के लिए मूल मूर्ति को बुनियादी शिलाखंड से अलग करना एक विकल्प हो सकता है। दूसरी संभावना है कि जितनी ऊंचाई मूर्ति की है (करीब आठ फीट) ठीक उतनी ही या उससे कुछ अधिक गहराई जमीन के भीतर मूर्ति की नींव की हो सकती है। पहले मूर्तियों को इस तरह से भी स्थापित किया जाता था।
पुरातत्वविद् रमण सोलंकी का कहना है कि मूर्ति प्राचीन समय में प्रचलित इंटरलॉकिंग तकनीक से स्थापित पाई जा सकती है। इस पद्धति में एक बड़ी शिला अंदर होती है और उसके साथ मूर्ति के निचले हस्से की शिला को जोड़ा जाता था।
इन तकनीकों का उपयोग संभव, मगर मामला पेचीदा
विद्युत प्रतिरोधक सर्वेक्षण (ईआरएस) : यह भूजल और जमीन के नीचे खनिज और चट्टानों की संरचना का पता लगाने की एक तकनीक है। इसमें विद्युत तरंगों के माध्यम से भूमि के भीतर के चट्टानों के आकार व भीतरी सतहों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। प्रोफेसर शैलेष चौरे का कहना है कि खड़े हनुमान मंदिर मामले में यह तकनीक बहुत सशक्त साबित नहीं होगी।
ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) : इस तकनीक के तहत भूमि के भीतर रडार से तरंगे भेजी जाती हैं। जब ये तरंगें किसी वस्तु या अलग घनत्व से टकराकर वापस आती हैं तो विशेष उपकरण उन्हें रिकॉर्ड कर वस्तु आदि का नक्शा या चित्र बना देते हैं। आधुनिक समय में इसका उपयोग पाइप लाइन आदि सर्वे के लिए किया जाता है। प्रोफेसर चौरे के अनुसार भूमि का वह स्थान जहां की संरचना का पता करना है, उसके ठीक ऊपर ही मूर्ति है। ऐसे में रडार सटीक विश्लेषण कर पाएगा, यह कहना कठिन है।
आसपास की खोदाई से खुल सकता है रहस्य
विशेषज्ञों का कहना है कि मूर्ति के आसपास तकनीक की सहायता से खोदाई करने से नींव की संरचना का पता लग सकता है। यह एक कारगार उपाय है।
दर्शन-पूजन का दौर जारी
इस बीच खड़े हनुमान मंदिर पर लगातार आस्था का ज्वार उमड़ रहा हैl गुरुवार को भी उज्जैन सहित आसपास के शहरों से हजारों भक्त भगवान के दर्शन करने उज्जैन पहुंचे। भक्त हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ भी कर रहे हैं।



