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मल्लिकार्जुन खरगे ने श्रीबाबू की विरासत से साधे 3 निशाने, क्या बिहार में बच पाएगी कांग्रेस की साख?

बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह की जयंती के मंच से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा को घेरने के लिए कई मुद्दे एक साथ उठा दिए।

निशाने पर चुनाव प्रक्रिया भी रही, सामाजिक गैरबराबरी भी और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक दिशा भी।

खरगे ने अपने भाषण में यह बताने की कोशिश की कि भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की लड़ाई केवल सत्ता बदलने की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र और विचारधारा को बचाने की लड़ाई है। आजादी की दूसरी लड़ाई का उनका आह्वान इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था।

खरगे ने भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की।

इसके जरिये उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश की, लेकिन बिहार में इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं।

सामाजिक आधार को जीवित करने की कवायद

कांग्रेस अध्यक्ष ने छुआछूत और सामाजिक बराबरी का सवाल उठाकर भाजपा-आरएसएस की विचारधारा पर भी हमला बोला। बिहार की राजनीति में जाति, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी हमेशा अहम रही है।

कांग्रेस की कोशिश इन सवालों को लोकतंत्र की बहस से जोड़ने की है, ताकि वह अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय कर सके।

मगर केवल मंच से सामाजिक न्याय की बात करने से बात नहीं बनेगी। पार्टी को यह भी दिखाना होगा कि वह अपने संगठन और नेतृत्व में इन मूल्यों को कितनी जगह देती है।

नीतीश कुमार पर जेपी और लोहिया के विचारों से दूर जाने का आरोप लगाकर खरगे ने बिहार की समाजवादी राजनीति को भी निशाने पर लिया।

इसके जरिये कांग्रेस ने उन लोगों के बीच भी अपनी जगह बनाने की कोशिश की, जो समाजवादी राजनीति की पुरानी विरासत को आज की राजनीति की कसौटी मानते हैं।

क्या बढ़ पाएगी राजनीतिक ताकत?

संदेश साफ था कि कांग्रेस भाजपा का विरोध करने के साथ उसके सहयोगियों की वैचारिक प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाएगी, लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी मुश्किल उसके अपने संगठन और राजनीतिक प्रभाव की है।

बिहार में भाजपा के खिलाफ आक्रामक बयान देना एक बात है और उस विरोध को गांव-कस्बों तक पहुंचाकर जनसमर्थन में बदलना दूसरी।

श्रीबाबू की विरासत का मंच कांग्रेस को अपने विचार रखने का अवसर दे सकता है, लेकिन उससे अपने आप राजनीतिक ताकत नहीं बढ़ेगी।

खरगे ने लड़ाई के मुद्दे तो तय कर दिए हैं, अब इन मुद्दों पर लगातार संघर्ष करना और जनता का भरोसा जीतना बिहार कांग्रेस के नेतृत्व की असली परीक्षा होगी।

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