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राम मंदिर चंदा चोरी: एसआईटी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करेगी स्टेटस रिपोर्ट

अयोध्या राम मंदिर में वित्तीय अनियमितताओं और दान के दुरुपयोग के आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक विशेष जांच दल (एसआईटी) सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने 13 जुलाई को एसआईटी को सीलबंद लिफाफे में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था जिसमें एसआईटी के गठन का उल्लेख किया गया था।

लखनऊ के संभागीय आयुक्त विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन की एसआईटी ने 23 जून को उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसके बाद एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी और अयोध्या के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) आशुतोष तिवारी को मामले का प्रमुख जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था।

इस मामले में आठ आरोपियों अविनाश शुक्ला, विकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, राम शंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रमाशंकर उर्फ टीनू यादव को गिरफ्तार किया गया है। आरोपी राम मंदिर में दान के रूप में प्राप्त नकदी और कीमती सामान की गिनती करने में शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर में दान के गबन के आरोपों के बाद ट्रस्ट के वित्त की जांच के लिए शीर्ष अदालत की निगरानी के तहत सीबीआई से स्वतंत्र जांच कराने की मांग करने वाली तीन जनहित याचिकाओं पर 13 जुलाई को केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नोटिस जारी किया था।

सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा दायर तीन जनहित याचिकाओं के जवाबों पर भी गौर करेगी, जिसमें ट्रस्ट के वित्त की सीधी निगरानी में सीबीआई द्वारा सीबीआई जांच की मांग की गई है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपने महासचिव चंपत राय और वरिष्ठ सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफे के बाद अपने कामकाज को पेशेवर बनाने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं।

चंदा चोरी पर सोमवार को होने वाली सुनवाई से पहले, निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या मंदिर का प्रबंधन करने वाले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि वर्तमान व्यवस्था में जवाबदेही की कमी है और यह 2019 के अयोध्या फैसले के साथ असंगत है।

अयोध्या विवाद में याचिकाकर्ताओं में से एक निर्मोही अखाड़ा ने अपने न्यासी बोर्ड द्वारा किए गए सभी वित्तीय और संपत्ति लेनदेन के फोरेंसिक ऑडिट और नई मूर्ति के स्थान पर स्थल पर 1950 और 1982 की मूर्तियों की बहाली की मांग की है।

याचिका में एक स्वतंत्र समिति की नियुक्ति की भी मांग की गई है जो इस बात की जांच करे कि क्या सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर, 2019 के अयोध्या फैसले में दिए गए निर्देशों को ट्रस्ट ने ईमानदारी से लागू किया है। अखाड़ा ने अयोध्या मालिकाना हक विवाद के निपटारे में एक विविध आवेदन दायर किया है, जिसमें संविधान पीठ द्वारा 9 नवंबर, 2019 के फैसले में जारी निर्देशों को लागू करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा दायर पहली जनहित याचिका में मामले की सीबीआई जांच और ट्रस्ट के वित्त के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) से ऑडिट कराने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ताओं के वकील अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव ने राम मंदिर में चंदे के दुरुपयोग के आरोपों की सीबीआई नीत बहु-अनुशासनात्मक एसआईटी से निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की भी मांग की है। वे चाहते थे कि एसआईटी ट्रस्ट के मामलों और प्रशासन से संबंधित कथित वित्तीय अनियमितताओं और अन्य कथित “अवैधताओं” की जांच करे।

राजद सांसद सुधाकर सिंह द्वारा दायर तीसरी जनहित याचिका में शीर्ष अदालत की सीधी निगरानी में चल रही जांच को सीबीआई को स्थानांतरित करने की मांग की गई है।

विशेष जांच दल (एसआईटी) की चल रही जांच और मामले में गिरफ्तार किए गए आठ आरोपियों से 77 लाख रुपये की कथित बरामदगी का हवाला देते हुए, बक्सर से राजद सांसद द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट के प्रशासन की रक्षा करना और लाखों भक्तों द्वारा दिए गए प्रसाद की रक्षा करना असाधारण सार्वजनिक महत्व का है।

सिंह ने ट्रस्ट के सभी दानों, लेन-देन और संपत्तियों का एक स्वतंत्र एजेंसी से व्यापक फोरेंसिक ऑडिट कराने की मांग की। जनहित याचिका में मांग की गई है कि ट्रस्ट को सार्वजनिक पारदर्शिता के हित में ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण और दान रिकॉर्ड को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

जनहित याचिका में भौतिक दस्तावेजों, डिजिटल बहीखाता, यूपीआई लेनदेन लॉग और बैंक स्टेटमेंट सहित सभी वित्तीय रिकॉर्ड को संरक्षित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, ताकि सबूतों के साथ किसी भी कथित छेड़छाड़ को रोका जा सके और प्रस्तावित निगरानी समिति की पूर्व मंजूरी के बिना ट्रस्ट को बड़े निवेश करने, पर्याप्त अनुबंध करने या महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने से रोकने का आदेश दिया जा सके।

सिंह चाहते हैं कि शीर्ष अदालत जांच के लंबित रहने के दौरान ट्रस्ट के धर्मनिरपेक्ष वित्तीय मामलों की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों और वित्तीय विशेषज्ञों की एक अस्थायी, अदालत की निगरानी वाली निगरानी समिति नियुक्त करे।

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