सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइयां के फैसले पर पूर्व जजों ने क्या प्रतिक्रिया दी

भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई और अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने मताधिकार से वंचित करने पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां के बहुप्रचारित बयान की सोमवार को आलोचना करते हुए कहा कि उन्हें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर ये टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि यह मुद्दा शीर्ष अदालत के समक्ष विचाराधीन है।
मौजूदा न्यायाधीश न्यायमूर्ति भुइयां ने रविवार को एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं न्यायमूर्ति बोधराज साहनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता में समापन भाषण देते हुए कहा कि लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया ‘आंतरिक रूप से मनमाना’ है और संवैधानिक व्यवस्था की ‘नकार’ है।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्गों का प्रावधान नहीं करता है, एक को मतदान का अधिकार है और दूसरा मतदान के अधिकार के बिना, और कोई भी “व्हाटबाउट” इस तरह की प्रक्रिया को उचित नहीं ठहरा सकता है।
इस मुद्दे पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में पूर्व सीजेआई गवई ने कहा, ‘न्यायिक औचित्य उन्हें इस मामले पर कोई टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देगा जो अदालत के समक्ष विचाराधीन है।
गवई ने कहा कि शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर बयान नहीं देना चाहिए जिस पर उसी अदालत में सुनवाई लंबित है।
गवई के विचारों को दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी ने भी प्रतिध्वनित किया। उन्होंने भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए।
न्यायमूर्ति ढींगरा ने कहा कि भुइयां का बयान ‘शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश की सीमा से परे है’ और इस तरह की टिप्पणी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं की जानी चाहिए जब मुद्दा उसी अदालत में लंबित हो।
ढींगरा ने कहा, ‘उन्हें इस तरह का बयान देने से पहले एक हजार बार सोचना चाहिए था.’ उन्होंने कहा कि जस्टिस भुइयां को इस मुद्दे के पूरे तथ्यों की जानकारी नहीं थी.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एसआईआर से संबंधित निर्णय कथित रूप से लिए जाने की खबरों के बारे में पूछे जाने पर न्यायमूर्ति ढींगरा ने कहा कि चुनाव आयुक्त असहमति के बारे में खुद बोल सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘वे सभी देश के शीर्ष नौकरशाह हैं जो बहुत महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं। वे अपने लिए बोल सकते हैं। किसी को भी उनकी ओर से बोलने की जरूरत नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर एस सोढ़ी ने एसआईआर की कवायद को मताधिकार से वंचित करने के रूप में पेश किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदान का अधिकार वैधानिक ढांचे द्वारा शासित होता है।
“आपके पास वोट है या आपके पास वोट नहीं है यह क़ानून पर निर्भर करता है। यदि आप क़ानून के मापदंडों के भीतर आते हैं, तो आपके पास एक वोट है। यदि आप क़ानून के मापदंडों के भीतर नहीं आते हैं, तो आपके पास वोट नहीं है, “न्यायमूर्ति सोढ़ी ने कहा।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में गलत तरीके से शामिल किया गया था या वह व्यक्ति वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है, तो इसका उपाय यह है कि हटाने के लिए कानून का पालन किया जाए या जहां पात्र हो वहां फिर से शामिल किया जाए।
अपने ही देश में नागरिकों को ‘दोयम दर्जा’ बनाने की कवायद के बयान पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति सोढ़ी ने कहा कि इस तरह के ‘कट्टर’ बयान इस मुद्दे पर तर्कसंगत दृष्टिकोण को नहीं दर्शाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘मेरा मतलब है कि ये कट्टरपंथी सोच और ये कट्टरपंथी बयान, मेरे विचार से, किसी चीज को देखने का बहुत परिपक्व तरीका नहीं हैं, खासकर जब आपको ऐसे क्षेत्र में होना चाहिए जो अपने तर्कसंगतता में उत्कृष्ट माना जाता है।
न्यायमूर्ति सोढ़ी ने कहा कि इसके बजाय इस बात की जांच करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए कि क्या कोई व्यक्ति कानूनी रूप से मतदाता सूची में बने रहने का हकदार है और क्या वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है।
एसआईआर की कवायद और चुनाव आयोग से संबंधित एक नए कानून की वैधता सहित कई मुद्दों पर याचिकाएं शीर्ष अदालत में लंबित हैं, जिसमें सीजेआई को चयन समिति से बाहर रखा गया है।
जस्टिस भुइयां को सार्वजनिक डोमेन में चर्चा किए जा रहे मुद्दों पर अपने विचार रखने के लिए जाना जाता है।



