मध्यप्रदेशराज्य

विशेष टिप्पणी : कलेक्टर-एसपी पर करवाई से क्या फर्क पड़ा? राजनीतिक दबाव पर भी प्रहार जरूरी

यदि कलेक्टर और एसपी ठान लें, तो जिले में अपराधियों को कौन कहे, बड़े से बड़ा गिरोह भी घुटने टेक देगा, लेकिन इस इच्छा शक्ति की कमी से मध्य प्रदेश की शानदार छवि आए दिन दागदार हो रही है। मुरैना और सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों का मामला जेहन से उतरा भी नहीं, इधर देवास में शराब की अवैध तस्करी रोकने में टीआई दिलीप पुरी को जान गंवानी पड़ी।

जिले की कानून व्यवस्था के लिए कलेक्टर और एसपी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं और पिछले मामलों में प्रदेश सरकार ने इन पर कार्रवाई भी की, लेकिन यह भी छुपी बात नहीं है कि मंत्री से लेकर विधायक तक जिले से लेकर थाने तक अपनी पसंद से पोस्टिंग का दबाव बनाते हैं।

सवाल है कि पुलिस का सिस्टम इतना कमजोर कैसे हो गया है कि उसे भोपाल में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की हत्या के आरोपित को पकड़ने में एक महीना लग गया? उसके खुफिया तंत्र की क्या दशा है कि उसे जहरीली, मिलावटी या अवैध शराब माफिया की सूचनाएं तक नहीं मिलतीं? देवास के मामले को देखें, तो प्रशासन की नाक के नीचे शराब के अवैध धंधे में मालवा से गुजरात की सीमा तक आवागमन का समानांतर नेटवर्क तैयार कर लिया गया।

यह नेटवर्क जिन क्षेत्रों से गुजरता है, वहां आबकारी और पुलिस विभाग में पोस्टिंग का हाल भी सभी जानते हैं कि इसके लिए अलग ही समानांतर व्यवस्था जोरदार तरीके से चलती रही है। जब तक समानांतर रास्ते और समानांतर व्यवस्था चलती रहेगी, पुलिस या अन्य विभागों में शहादत को रोक पाना कैसे संभव होगा?

शराब के मामले में ही बीते दिनों प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, जिनके पास आबकारी विभाग भी है, जगदीश देवड़ा के तत्कालीन ओएसडी दीपक रायचुरा पर एक करोड़ रुपये रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। उन्होंने फर्जी एफडीआर से शराब का ठेका भी दे दिया था। बात खुली, तो उन्हें निलंबित किया गया, लेकिन बड़ा सवाल है कि रायचुरा कोई भी काम अपने ही स्तर पर कर सकते हैं? निश्चित तौर संरक्षण प्राप्त होगा।

दूसरा सवाल उन्हें सस्पेंड करने के असर का है। इससे पहले सागर और अन्य जिलों में अधिकारियों को निलंबित करने का क्या फर्क पड़ा था? यह सभी जानते हैं कि पानी ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है, तो संरक्षण पर जवाब भी ऊपर से ही तलब करना होगा।

आज भी ज्यादातर मंत्रियों और विधायकों की निजी पदस्थापना में वर्षों से अंगद की तरह पांव जमाने वालों की बड़ी संख्या है। ये किसी भी दशा में अपनी मूल पदस्थापना में जाने से जुगत लगाकर बचते रहते हैं, चाहे कभी उनके मंत्री रहे नेता अब मंत्री या शायद विधायक भी ना रह गए हों। जब तक राजनीतिक संरक्षण की मूल वजहों की तलाश नहीं होगी, गवर्नेंस को मजबूत बनाना कैसे संभव हो सकेगा?

जब तक विधायक अपनी मर्जी का थानेदार और मंत्री जिले के कलेक्टर और एसपी पसंद से चुनते रहेंगे, कानून व्यवस्था पर लगाम लगाने की प्रशासनिक तंत्र से उम्मीद बेमानी है।

देवास की घटना को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पुलिस मुख्यालय में बैठक की है। उम्मीद की जा सकती है कि बैठक के बेहतर परिणाम दिखाई देंगे। मुख्यमंत्री यादव इससे पहले सागर और देवास के कलेक्टर-एसपी को हटाकर स्पष्ट संदेश दे चुके हैं और लैंडमार्क तय कर दिया है कि किसी भी जिले में ऐसे मामले होंगे, तो कार्रवाई के दायरे से कलेक्टर और एसपी भी बाहर नहीं होंगे।

इधर, एसपी आदित्य मिश्रा को बालाघाट से देवास भेजा गया है। आदित्य की पहचान तेजतर्रार अधिकारियों में है, जो कार्रवाई के मामले में राजनीतिक दबाव को बर्दाश्त नहीं करते। उनसे देवास में अवैध शराब तस्कर माफिया पर कड़ी कार्रवाई की उम्मीद है।

प्रशासनिक स्तर पर कमजोर इच्छा शक्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते मध्य प्रदेश की पहचान छिंदवाड़ा के सीरप कांड से, तो बीमारी से बैगा बच्चों की मौत से या फिर जहरीली शराब से होने वाली मौत के बाद अब शराब तस्कर के वाहन से टीआई की मौत से हो रही है।

मजबूत कानून व्यवस्था, सुशासन के दावों की सफलता और नागरिक ही नहीं, अधिकारियों के भी जीवन की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक जमावट में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी और इससे राजनीतिक हस्तक्षेप को भी दूर ही रखना होगा। तभी शांति के टापू की पहचान मध्य प्रदेश कायम रख पाएगा।

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