बिहारराज्य

कभी क्लासरूम में बैठकर पढ़ा, आज उसी यूनिवर्सिटी में बनीं साइंटिस्ट; बिहार में नौसेना अफसर की बेटी ने बढ़ाया मान

मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में उड़ान और इरादों में आसमान छूने का हौसला होता है। अंग की धरती मुंगेर जिले के लक्ष्मीपुर से निकलकर डॉ. प्रीति सिंह ने अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास से सफलता की ऐसी कहानी लिखी है, जो बेटियों के लिए प्रेरणा है।

बचपन से मेधावी रहीं प्रीति ने पढ़ाई के हर पड़ाव पर अपनी योग्यता साबित की। खास बात यह कि उन्होंने अब तक किसी परीक्षा को दोबारा देने की जरूरत नहीं पड़ी।

जिस बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में कभी विद्यार्थी बनकर शिक्षा हासिल की, आज उसी संस्थान में सहायक प्राध्यापक सह कनीय विज्ञानी के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

शोध के प्रति उनकी लगन को देखते हुए उन्हें विश्वविद्यालय की टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। यहां वह पौधों पर शोध कर बेहतर गुणों वाले और रोगमुक्त पौधों के विकास की दिशा में काम कर रही हैं।

देश में तीसरी रैंक से पीएचडी तक का सफर

डॉ. प्रीति के पिता नौसेना में अधिकारी थे। नौकरी के कारण उनका अलग-अलग स्थानों पर तबादला होता रहता था। ऐसे में प्रीति की स्कूली शिक्षा विशाखापत्तनम से लेकर मुंबई तक हुई।

11वीं और 12वीं की पढ़ाई उन्होंने केंद्रीय विद्यालय जमालपुर से पूरी की। इसके बाद बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर से बीएससी कृषि की पढ़ाई की।

आगे बढ़ने की ललक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में उतारा। जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) की परीक्षा में देशभर में तीसरा स्थान हासिल किया। इसके बाद भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली से परास्नातक और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की।

पीएचडी के दौरान ही बिहार कृषि विश्वविद्यालय में निकली नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल हुईं और अपनी योग्यता के दम पर चयनित होकर कृषि महाविद्यालय, सबौर के उद्यान विभाग में सहायक प्राध्यापक सह कनीय विज्ञानी के पद पर योगदान दिया।

शोध के प्रति उनकी रुचि और काम करने के जुनून को देखते हुए विश्वविद्यालय ने उन्हें टिश्यू कल्चर लैब की जिम्मेदारी सौंपी। यहां पौधों के संवर्धन, उनकी गुणवत्ता और रोगमुक्त पौध सामग्री विकसित करने की दिशा में उनका शोध कार्य जारी है।

चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी

डॉ. प्रीति बताती हैं कि पिता नौकरी के सिलसिले में अक्सर घर से बाहर रहते थे। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण अपनी पढ़ाई के साथ छोटे भाई-बहनों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई।

किशोरावस्था से ही उन्हें पढ़ाई और भविष्य को लेकर स्पष्ट लक्ष्य था। कई बार घर से दूर रहकर देश के अलग-अलग संस्थानों में पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी की, लेकिन आत्मविश्वास और एकाग्रता बनाए रखी।

उनका मानना है कि आत्मबल, मेहनत, एकाग्रता और लगन हो तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता खुद बनता जाता है। बेटियों को संदेश देते हुए वह कहती हैं कि अपने लक्ष्य को लेकर स्पष्ट रहें और परिस्थितियों से घबराने के बजाय निरंतर प्रयास करें।

डॉ. प्रीति की यात्रा बताती है कि प्रतिभा को सही दिशा और मेहनत का साथ मिल जाए तो छोटे से गांव की बेटी भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकती है।

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