आयरन कमी और थैलेसीमिया में क्या अंतर है? चिकित्सक से परामर्श करें

शरीर में आयरन की कमी और थैलेसीमिया में क्या अंतर है? दोनों बीमारियों में शरीर में खून की कमी होती है और हीमोग्लोबिन प्रभावित होता है। दोनों बीमारियां लापरवाही से खतरनाक हो सकती हैं। दोनों बीमारियों में क्या फर्क है और उनका प्रबंधन कैसा है? बता रहे हैं अनुभवी
थैलेसीमिया और आयरन की कमी रक्त को प्रभावित करती हैं। लेकिन दोनों की समस्याएं एक दूसरे से अलग हैं और दोनों को अलग-अलग तरह से उपचार दिया जाता है। मरीज के लिए दोनों ही समस्याएं खतरनाक हैं। लापरवाही दोनों बीमारियों में मरीज की जान को खतरा बनाए रखती है। दोनों रोगों में हीमोग्लोबिन पर प्रभाव पड़ता है।
शरीर में आयरन की कमी एनीमिया को जन्म दे सकती है। शरीर में आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है। इससे शरीर को ऑक्सीजन की आपूर्ति भी प्रभावित होती है। इससे कई समस्याएं पैदा होती हैं। जबकि थैलेसीमिया जन्मजात है। हालांकि दोनों ही स्थितियों में शरीर में रक्त की कमी होती है।
शरीर थैलेसीमिया में हीमोग्लोबिन कम बनाता है। यह बीमारी हल्की और गंभीर है। माइल्ड बीमारी में बहुत अधिक सतर्कता की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन गंभीर बीमारी में नियमित जांच और इलाज की आवश्यकता होती है।
कैसे पता चलता है?
आईएमए के स्टेट सेक्रेटरी डॉ. वीबी जिंदल कहते हैं कि थैलेसीमिया और आयरन की कमी को लक्षणों के आधार पर स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सकता। थैलेसीमिया और शरीर में आयरन की कमी के लिए सामान्य ब्लड टेस्ट आवश्यक हैं। ब्लड टेस्ट से पता चलता है कि शरीर में आयरन की कमी है या फिर थैलेसीमिया रोग है।
थैलेसीमिया रोग का पता लगाने के लिए सीबीसी जांच और आयरन स्टोर और स्तर की जांच की जाती है। जांच के बाद समस्या का समाधान किया जाता है।
प्रबंधन कैसे करें?
थैलेसीमिया जन्मजात है। जो माता-पिता से बच्चों में आता है। शादी से पहले दोनों को इस बीमारी की जांच करानी चाहिए। डॉक्टर से कंसल्ट करने के बाद ही परिवार शुरू करना चाहिए। इस बीमारी का कोई उपचार नहीं है; सिर्फ इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
माता-पिता कोई भी इस बीमारी के वाहक हो सकते हैं और बच्चे को भी यह बीमारी हो सकती है. जबकि आयरन की कमी होने पर उसका इलाज संभव है. दवाओं के साथ खानपान में सुधार करके इस बीमारी से निजात पाई जा सकती है.



