आशा भोसले जैसी सिंगर होना आसान नहीं, लता मंगेशकर की छत्रछाया में कैसे बनाई अलग पहचान?

दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित दिग्गज गायिका आशा भोसले ने 92 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया.
आशा भोसले ने अपनी लाइफ में विद्रोह और प्रोफेशन में जो-जो प्रयोग किए, ये सब आज की पीढ़ी को ठीक से नहीं मालूम होगा.
लता मंगेशकर की छत्रछाया में दूसरी प्रतिभा की पहचान कितनी बड़ी तपस्या और साधना थी, जानते हैं.
गौरतलब है कि लता मंगेशकर और आशा भोसले सगी बहनें जरूर थीं लेकिन अभिरुचि, मिजाज और गायकी तीनों ही स्तर पर बिल्कुल जुदा थीं. दोनों ने कम उम्र से ही गाना प्रारंभ कर दिया था. लता मंगेशकर क्लासिकी की परंपरा का पालन करने के लिए जानी गईं लेकिन आशा ने क्लासिकी में मॉडर्न का प्रयोग करके अपने लिए नया श्रोता वर्ग तैयार किया. उनके आचार-विचार जितने विद्रोही रहे. संगीत में आगे बढ़ने और अपने लिए नई परंपरा गढ़ने के मिशन पर भी उतनी ही शिद्दत से जुटी रहीं.
आशा ने महज सोलह साल की उम्र में अपनी बहन के सचिव से घरवालों की मर्जी के खिलाफ शादी रचाई. उनका पहला पति उम्र में उनसे दोगुना बड़ा था. लेकिन जब वह शख्स संगीत साधना में रुकावट बनने लगा तो उन्होंने शादी तोड़ दी और आरडी बर्मन यानी पंचम दा से दूसरा विवाह रचाया, जोकि उनसे उम्र में छोटे थे. समय और साधना ने आशा की प्रतिभा का साथ दिया. लता की संगीत साधना की आराधना करते हुए भी आशा ने अपना एक अलग शिखर खुद से तैयार किया था.
यों लता मंगेशकर ने साठ और सत्तर के दशक में बहुत से ऐसे गाने गाये हैं, जो जोश, जवानी, प्रेम और सौंदर्य की भावना से युक्त हैं. लेकिन आशा भोसले ने अपने लिए भविष्य की नई लकीर खींची. उन्होंने एक बार एक बातचीत में कहा था कि दूसरी लता बनना आसान नहीं. लता की तरह केवल लता ही गा सकती थी. ये बात उन्होंने बहुत पहले ही भांप ली थी. लता जैसी गायिका सदियों में पैदा होती है. अलग पहचान बनानी है और संगीत में नई ऊंचाई हासिल करनी है तो कुछ अलग करना होगा.
तब उन्होंने कहा कि अलग पहचान बनाने के लिए क्लासिकल के साथ वेस्टर्न भी सुना, अपने सुर निखारे. आशा की इस मेहनत, प्रतिभा, विद्रोही विचार और उनकी आवाज़ की खनक से ओपी नैय्यर और आरडी बर्मन जैसे संगीतकार बखूबी वाकिफ हो चुके थे. जिन्होंने आशा को उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर से अलग राह पर ले जाने में काफी मदद की.

ओपी नय्यर ने प्रतिभा को पहचाना
आशा भोसले की आवाज में एक ऐसी क्वालिटी थी, जिसकी दरकार साठ और सत्तर के दशक के संगीतकारों को थी. इस क्वालिटी को सबसे पहले संगीतकार ओपी नय्यर ने पहचाना. नय्यर वेस्टर्न ट्यून को भारतीय पहचान के साथ प्रस्तुत करने में खासी दक्षता रखने के लिए जाने जाते थे. गायिकाओं में उनकी पसंद कभी गीता दत्त हुआ करती थीं, जिन्हें एसडी बर्मन भी खूब पसंद करते थे. लेकिन गुरु दत्त के निधन के बाद गीता दत्त ने फिल्मों में गाना कम कर दिया.
अब ओपी नैय्यर को गीता दत्त की जगह भरने वाली आवाज की दरकार थी. ऐसे में उनके सामने आशा भोसले एक विकल्प के तौर पर नजर आईं. उन्होंने सबसे पहले 1957 में आई दिलीप कुमार-बैजयंती माला की फिल्म नया दौर में उन्हें मौका दिया. इस फिल्म में उन्होंने चार गाने गाये- मांग के साथ तुम्हारा, मैंने मांग लिया संसार… उड़ें जब जब जुल्फें तेरी… साथी हाथ बढ़ाना… रेशमी सलवार, कुर्ता जाली का… एक दीवाना आते जाते… इन गानों में उन्हें मो. रफी और शमशाद बेगम का साथ मिला. फिल्म हिट हुई और इसके सारे गाने भी.
इसके बाद तो आशा भोसले का सिक्का चल निकला. संगीतकार ओपी नय्यर ने आशा भोसले के साथ आगे भी गाने बनाए. मसलन राजकुमार और सुनील दत्त की फिल्म वक्त. इस फिल्म में भी उन्होंने चार गाने गाये. सारे हिट हुए- कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी…हम जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए…चेहरे पर खुशी छा जाती है या फिर आगे भी जाने ना तू...और इसके बाद संगीतकार ओपी नय्यर ने निर्देशन में ही जब हमराज में महेंद्र कपूर के साथ तू हुस्न है, मैं इश्क हूं, तू मुझ में है, मैं तुझ में हूं… गाया तो आशा की आवाज की खनक दूर तलक जा चुकी थी.
इन गानों से आशा की लोकप्रियता और भी बढ़ी. गौरतलब है कि जिस साल वक्त आई थी, उसी साल मीना कुमारी की फिल्म काजल भी आई, संगीतकार रवि के निर्देशन में जिसका एक भजन आशा भोसले ने गाया जो आज भी खूब सुना जाता है- तोरा मन दर्पण कहलाए…
लता से तनाव नहीं, प्रेरणास्रोत मानती थीं
इन गानों ने आशा भोसले की गायकी की विविधता को स्थापित कर दिया. तब के तमाम संगीतकारों ने भली भांति समझ लिया कि लता मंगेशकर के सामने अगर किसी गायिका में खड़ी हो सकने का माद्दा है तो वह कोई और नहीं बल्कि खुद उनकी छोटी बहन आशा भोसले हैं. एक समय तो ऐसा भी आया कि गॉसिप में लता और आशा के बीच तनाव की खबरें भी फैलने लगीं. क्योंकि गॉसिप में ये बातें भी कही जाती हैं कि लता मंगेशकर ने अपने करियर के चरम के दौरान किसी और गायिका को उभरने नहीं दिया. इस लिहाज से अपने घर की ही सिंगर आशा भोसले ने लता को सबसे बड़ी चुनौती दे दी.
हालांकि आशा भोसले ने हमेशा इस तरह के नैरेटिव को खारिज किया. उन्होंने लता मंगेशकर को केवल एक बड़ी बहन नहीं माना बल्कि अपनी प्रेरणा स्रोत माना है. हां, लता के इतर अलग रास्ता बनाने की बात वो जरूर कुबूल करती थीं. लेकिन दोनों ने कई गाने साथ-साथ गाये हैं. उत्सव फिल्म का उनका एक युगल गीत बहुत लोकप्रिय हुआ- मन क्यूं बहका रे बहका आधी रात को, बेला महका रे महका आधी रात को…
आशा की प्रतिभा को आरडी बर्मन ने निखारा
गौरतलब है कि आशा भोसले की प्रतिभा को जिन दो संगीतकारों ने सबसे करीब से पहचाना और निखारा उनमें दूसरे थे- आरडी बर्मन, जिनसे उन्होंने बाद में विवाह भी रचाया. ओपी नैय्यर ने प्रतिभा को पहचाना तो बर्मन ने उस प्रतिभा को निखारा और नई रेंज और वैरायिटी दी. आशा की गायकी की काबिलियत का भरपूर उपयोग किया. प्रारंभ में तीसरी मंजिल और कारवां जैसी लोकप्रिय फिल्मों के गानों ने रातों रात धूम मचा दी. आशा और आरडी की जोड़ी सबसे हिट हुई, क्योंकि दोनों मिजाज से प्रयोगवादी थे.
आशा अपनी आवाज के निखार में खूब प्रयोग करती थीं तो आरडी अपने संगीत में वेस्टर्न या रॉक का ऐसा प्रयोग करते जिस पर युवाओं की टोली फिदा हो जाती. दोनों बहुत ही मॉडर्न ख्यालात के थे. पिया तू अब तो आजा… गाने जैसा प्रभाव इस जोड़ी से ही संभव था. सत्तर और अस्सी के दशक का संगीत इस जोड़ी के नाम है.
हेलन हो या रेखा, हेमा-सबको दी आवाज
आशा भोसले ऐसी गायिका थीं जो वक्त के साथ चलने में यकीन रखती थीं. उन्होंने शंकर जयकिशन, ओपी नय्यर, रवि, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आरडी बर्मन, बप्पी लाहिड़ी से लेकर ए आर रहमान के साथ भी गाने गाये हैं. वह बैजयंती माला, मीना कुमारी से लेकर हेलन, जीनत अमान, हेमा, परबीन बॉबी, रेखा, श्रीदेवी, उर्मिला मातोंडकर तक सभी दौर की अभिनेत्रियों को आवाज दी है. शास्त्रीय संगीत को कभी उन्होंने छोड़ा नहीं. इसके साथ-साथ लोकगीत, भजन, गजल और कव्वाली भी बखूबी गाती थीं.
कुछ महीने पहले की बात है. उमराव जान री-रिलीज का मौका था. मंच पर मुजफ्फर अली, रेखा के साथ आशा भोसले भी थीं. 91 साल की उम्र में उनकी आवाज में वही खनक और शोखियां. जब उन्होंने गाया- ये क्या जगह है दोस्तो… ये कौन सा दयार है… तो फिजां में तालियां गूंजने लगीं. आशा भोसले की गायकी सुन लोग झूम उठे. आज लता की तरह आशा भी दुनिया से रुखसत हो गईं लेकिन लता की तरह आशा भी संगीत की एक बड़ी विरासत छोड़ गईं है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी.



