पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी समाज का कितना प्रभाव? 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समझिए पूरा समीकरण

उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में तमाम पार्टियां वोट बैंक को मजबूत करने के लिए जातियों को साधने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन इसी बीच यूपी की सियासत में अब मौर्य समाज को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है. दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य और सपा के मुखिया अखिलेश यादव के बीच तनातनी अब पोस्टर पर भी दिखने लगी है. स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थकों ने लखनऊ में समाजवादी पार्टी के बहिष्कार वाले पोस्टर लगाए हैं. इसके बाद राज्य में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज की राजनीतिक अहमियत पर चर्चा शुरू हो गई है. यादव और कुर्मी के बाद ओबीसी वर्ग में यह तीसरा सबसे बड़ा वोटबैंक है, जिसकी प्रदेश में करीब 6.69 फीसदी आबादी है. पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक करीब 100 से अधिक विधानसभा और एक दर्जन लोकसभा सीटों पर यह समाज हार-जीत तय करने की ताकत रखता है. ऐसे में आगामी 2027 के चुनाव को लेकर भाजपा और सपा दोनों ही इस बड़े वोटबैंक को साधने की रणनीति में जुट गए हैं

कितनी है इस समाज की आबादी?

उत्तर प्रदेश में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी को सामाजिक रूप से एक ही उप-जातीय समूह माना जाता है. ऐतिहासिक रूप से यह समाज खुद को भगवान बुद्ध, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और महान सम्राट अशोक से जोड़ता है. साल 2001 की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी 6.69 फीसदी है. 2011 की जनगणना के आधार पर अनुमान लगाएं तो इनकी संख्या 1.20 करोड़ से 1.34 करोड़ के बीच बैठती है. यह मुख्य रूप से कृषि और सब्जी के व्यवसाय से जुड़ा समाज है.

किन क्षेत्रों में है इनका प्रभाव

यह समाज यूपी के करीब 15 जिलों में 15 फीसदी के आसपास है. पश्चिमी यूपी में इन्हें सैनी, ब्रज और कानपुर देहात में शाक्य, बुंदेलखंड और पूर्वांचल में कुशवाहा और अवध व रुहेलखंड में मौर्य नाम से जाना जाता है. पूर्वांचल के गोरखपुर, वाराणसी, कुशीनगर, मिर्जापुर, और प्रयागराज से लेकर बुंदेलखंड के बांदा, झांसी और जालौन तक इनका अच्छा दबदबा है. वहीं पश्चिमी यूपी के मेरठ, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर में सैनी समाज की आबादी 15 से 20 फीसदी है.

100 विधानसभा सीटों पर है दबदबा

यूपी की 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर यह समाज चुनाव परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. इन सीटों पर इस समाज के 40 से 50 हजार तक मतदाता हैं, जो किसी भी प्रत्याशी की हार-जीत तय करते हैं. इसके साथ ही करीब एक दर्जन लोकसभा सीटें जिनमें सलेमपुर, देवरिया, बदायूं, आंवला, मैनपुरी, एटा आदि है. यहां पर इस समाज के दो से साढ़े तीन लाख तक वोट हैं.

सत्ता और राजनीति में कितनी हिस्सेदारी

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में इस समाज के 14 विधायक चुने गए थे, जिनमें 11 भाजपा और दो सपा के टिकट पर जीते थे. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में इस समाज के तीन सांसद जिनमें बाबू सिंह कुशवाहा, देवेश शाक्य और नीरज मौर्य शामिल है. यह तीनों ही सपा के टिकट पर संसद पहुंचे हैं. योगी सरकार में इस समाज से केशव प्रसाद मौर्य डिप्टी सीएम हैं, जबकि जसवंत सिंह सैनी राज्यमंत्री हैं. भाजपा की तरफ से अमरपाल मौर्य राज्यसभा सांसद भी हैं.

क्या है समाज का वोटिंग पैटर्न

यह समाज कभी भी किसी एक पार्टी का स्थायी वोटबैंक नहीं रहा है. शुरुआत में कांग्रेस को वोट देने वाला यह समाज बाद में लोकदल, जनता दल और फिर बसपा के साथ खड़ा नजर आया. 2017 के चुनाव में भाजपा को इस समाज का करीब 90 फीसदी वोट मिला था. हालांकि 2022 और 2024 के चुनाव में सपा ने भी इस वोटबैंक में सेंधमारी की है, जिसका नतीजा उनके तीन सांसदों की जीत के रूप में सामने आया.

सियासत में समाज के प्रमुख चेहरे

भाजपा के पास डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरपाल मौर्य और जसवंत सिंह सैनी जैसे बड़े चेहरे हैं. सपा के पास बाबू सिंह कुशवाहा, देवेश शाक्य और नीरज मौर्य के रूप में मजबूत प्रतिनिधित्व है. वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य भी इस समाज के बड़े नेता माने जाते हैं, जो अब सपा से अलग होकर अपनी नई पार्टी बना चुके हैं. पश्चिमी यूपी में धर्मसिंह सैनी भी एक बड़ा नाम हैं, जो फिलहाल किसी दल में नहीं हैं.

मिशन 2027 में क्या होगी भूमिका

आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने अपने इस गैर-यादव ओबीसी गठबंधन को बचाए रखने की बड़ी चुनौती होगी. दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस का गठबंधन अपने पीडीए फॉर्मूले के जरिए शाक्य और कुशवाहा नेताओं को आगे करके इस वोटबैंक को अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश कर रहा है. स्वामी प्रसाद मौर्य भी कांग्रेस से हाथ मिलाकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह समाज अगले चुनाव में किस पार्टी की सत्ता का रास्ता साफ करता है.

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