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छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने पूर्व क्रिकेटर राजेश चौहान के खिलाफ 15 लाख रुपये की धोखाधड़ी के मामले में जांच के आदेश दिए हैं।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की एक अदालत ने पुलिस को पूर्व भारतीय क्रिकेटर राजेश चौहान के खिलाफ जांच करने का निर्देश दिया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एक स्टील कंपनी के साथ परिवहन अनुबंध की पेशकश करने के नाम पर एक व्यक्ति से 15 लाख रुपये से अधिक की धोखाधड़ी की थी।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ऐश्वर्या दीवान ने 16 जुलाई को पारित एक आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 (3) के तहत शिकायतकर्ता दिनकर विश्वामित्र द्वारा दायर एक आवेदन को स्वीकार कर लिया और मोहन नगर पुलिस को कानूनी जांच करने और अदालत के समक्ष अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

आवेदन के अनुसार, चौहान ने विश्वामित्र को अपना परिचय पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के रूप में दिया और दावा किया कि उनकी कंपनी गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी ने लौह अयस्क और गांठ के परिवहन के लिए ओडिशा के क्योंझर जिले में जिंदल स्टील लिमिटेड से एक अनुबंध हासिल किया था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि चौहान ने पर्याप्त लाभ का वादा किया और एक भागीदार के रूप में ट्रकों को तैनात करके परिवहन व्यवसाय में निवेश करने के लिए उसे राजी किया।

आवेदन में कहा गया है कि अपने दावों के समर्थन में चौहान ने कथित तौर पर उन्हें जिंदल स्टील लिमिटेड द्वारा गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी के पक्ष में कथित तौर पर जारी किए गए वर्क ऑर्डर दस्तावेज दिखाए।

दस्तावेजों को असली मानते हुए, विश्वामित्र ने 30 जुलाई, 2021 को चौहान के साथ एक समझौता किया और एक चेक के माध्यम से 2.51 लाख रुपये का भुगतान किया।

आवेदन में कहा गया है कि इसके बाद उन्होंने प्रस्तावित परिवहन कारोबार के लिए गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी के बैंक खाते में दो किस्तों में 15.01 लाख रुपये ट्रांसफर किए।

आवेदन में आरोप लगाया गया है कि चौहान ने संतोषजनक जवाब देना बंद कर दिया तो विश्वामित्र ने जिंदल स्टील लिमिटेड से संपर्क किया और उन्हें पता चला कि न तो चौहान और न ही गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी को कभी कोई परिवहन ठेका दिया गया है। इसमें आगे दावा किया गया कि उन्हें दिखाया गया वर्क ऑर्डर फर्जी और मनगढ़ंत था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि मोहन नगर पुलिस स्टेशन और बाद में दुर्ग के पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देने के बावजूद, कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई, जिसके बाद उन्हें बीएनएसएस की धारा 175 (3) के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

रिकॉर्ड पर आवेदन और दस्तावेजों की जांच करने के बाद, अदालत ने कहा कि सामग्री एक संज्ञेय अपराध के गठन का संकेत देती है और पुलिस ने शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की थी।

अदालत ने आगे कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसी सामग्री है जो बताती है कि प्रतिवादी ने शिकायतकर्ता को कथित तौर पर धोखा देकर बेईमानी से धन अर्जित किया था, जिसके लिए पुलिस जांच की आवश्यकता थी।

संपर्क किए जाने पर चौहान ने कहा कि विवाद व्यावसायिक प्रकृति का है।

उन्होंने कहा, “शिकायतकर्ता के कुछ पैसे पहले ही वापस कर दिए गए हैं, जबकि शेष राशि के पुनर्भुगतान में व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण देरी हुई है।

दुर्ग के पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल ने कहा कि पुलिस को अभी तक अदालत का आदेश नहीं मिला है।

उन्होंने कहा, “आदेश प्राप्त होने के बाद मामले की जांच की जाएगी और कानून के अनुसार आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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