
जन्म से ही बाहरी कान नहीं होने का मतलब यह नहीं कि बच्चा कभी सुन नहीं सकेगा। आधुनिक चिकित्सा तकनीक ने ऐसे बच्चों के लिए भी सुनने का रास्ता खोल दिया है।
एम्स पटना में पहली बार बोन कंडक्शन इम्प्लांट सर्जरी की गई है। इसमें आवाज कान के बाहरी हिस्से और कान की नली से होकर नहीं, बल्कि खोपड़ी की हड्डियों के कंपन के माध्यम से अंदरूनी कान तक पहुंचाई जाती है।
इससे जन्मजात रूप से बाहरी कान नहीं होने या कान की नली बंद होने की समस्या से जूझ रहे बच्चों को सुनने में मदद मिल सकती है। शुक्रवार को एम्स के ईएनटी विभाग में एक छोटे बच्चे की यह सर्जरी सफलतापूर्वक की गई।
बच्चे के जन्म से ही दोनों बाहरी कान नहीं थे। इसी दिन सुनने की गंभीर समस्या से जुड़े दो अन्य मरीजों की काक्लियर इम्प्लांट सर्जरी भी की गई। इनमें एक बच्चा और एक वयस्क है।
एम्स पटना के हियरिंग इम्प्लांट कार्यक्रम में अबतक 400 से अधिक सर्जरी हो चुकी हैं। सर्जरी का नेतृत्व डॉ. क्रांति भावना ने किया। मौके पर ईएनटी विभाग ने हियरिंग साल्यूशंस पर सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) का आयोजन किया।
इसमें डॉ. क्रांति भावना, अतिथि विशेषज्ञ डॉ. राजेश विश्वकर्मा व डा. लीना विश्वकर्मा ने सुनने से जुड़ी समस्याओं और उनके आधुनिक उपचार पर प्रकाश डाला। बोन कंडक्शन इम्प्लांट की सर्जरी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत की गई।
बाहरी कान की समस्या में कैसे काम करता है इम्प्लांट
सामान्य तौर पर आवाज हवा के माध्यम से कान की नली, पर्दे और मध्य कान की छोटी हड्डियों से गुजरते हुए अंदरूनी कान तक पहुंचती है। कुछ बच्चों में जन्म से ही बाहरी कान या कान की नली पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसे मेडिकल भाषा में माइक्रोटिया और एट्रेसिया कहा जाता है।
ऐसे बच्चों में आवाज अंदरूनी कान तक पहुंचने में बाधा आती है। बोन कंडक्शन इम्प्लांट इस बाधा को दूर करने में मदद करता है। यह उपकरण आवाज को कंपन में बदलता है।
ये कंपन खोपड़ी की हड्डियों के माध्यम से सीधे अंदरूनी कान तक पहुंचते हैं। इस तरह बाहरी और मध्य कान की खराबी को दरकिनार कर सुनने में मदद मिलती है।
यह तकनीक सिर्फ सुनने तक सीमित नहीं है। बचपन में सुनने की समस्या की पहचान और समय पर उपचार नहीं होने से बच्चे के बोलने, भाषा सीखने और पढ़ाई करने की क्षमता प्रभावित होती है।
काक्लियर व बोन कंडक्शन इम्प्लांट में अंतर
बोन कंडक्शन इम्प्लांट : बाहरी या मध्य कान की बनावट में कमी होने पर खोपड़ी की हड्डियों के कंपन से आवाज अंदरूनी कान तक पहुंचाता है।
काक्लियर इम्प्लांट : जब अंदरूनी कान की सुनने वाली कोशिकाएं ठीक से काम नहीं करतीं और सामान्य हियरिंग एड से पर्याप्त लाभ नहीं मिलता, तब यह तकनीक उपयोगी होती है। इसमें आवाज को विद्युत संकेतों में बदलकर सुनने की नस तक पहुंचाया जाता है।
– दोनों ही मामलों में सर्जरी के बाद डिवाइस की सेटिंग, नियमित जांच और सुनने-बोलने का अभ्यास महत्वपूर्ण होता है। इम्प्लांट से सामान्य सुनने की क्षमता की गारंटी नहीं होती। परिणाम मरीज की स्थिति और उपचार बाद मिलने वाले प्रशिक्षण पर निर्भर करते हैं।



