सिंधु जल संधि स्थगित रहेगी, भारत के पास बाहर निकलने का विकल्प : सूत्र

सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) स्थगित रहेगी, और भारत के पास पूरी तरह से बाहर निकलने का विकल्प बरकरार है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, किसी भी रूप में समझौते का कोई भी पुनरुद्धार दो शर्तों पर निर्भर करता है: समझौते की शर्तों पर फिर से बातचीत करना और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद के लिए अपना समर्थन समाप्त करना। जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण पर भी काम चल रहा है, इस साल अतिरिक्त 3,500 मेगावाट क्षमता चालू होने की उम्मीद है।
सूत्रों ने कहा कि संधि अपने वर्तमान स्वरूप में ‘क्षीण’ हो चुकी है और 1960 में दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षरित शर्तों पर फिर से बातचीत किए बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। विश्व बैंक के तत्वावधान में हुई इस संधि में सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी को दोनों पड़ोसी देशों के बीच आवंटित किया गया है। भारत ने पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में आईडब्ल्यूटी को स्थगित कर दिया था।
सूत्रों ने कहा, ‘संधि पर आगे बढ़ने की कोई भी प्रक्रिया पूरी तरह से पाकिस्तान की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, ‘हमें ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि पाकिस्तान ने सीमा पार आतंकवाद को अपना समर्थन देने के लिए कुछ किया है या आईडब्ल्यूटी की शर्तों पर फिर से बातचीत करने की तैयारी दिखाई है।
पाकिस्तान पिछले चार दशकों से सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित कर रहा है, ऐसे में भारत को संधि में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। नई दिल्ली पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में भी भाग नहीं लेगी।
सूत्रों ने कहा, ‘हम खुद को इन पुरस्कारों से बंधा हुआ नहीं मानते।
IWT में एक श्रेणीबद्ध विवाद-समाधान तंत्र है। पहला, दोनों देशों के सिंधु जल आयुक्तों के बीच मुद्दों को सुलझाया जाना है। यदि समाधान नहीं होता है, तो सचिव स्तर की वार्ता आयोजित की जाती है। यदि वह विफल हो जाता है, तो मामला एक तटस्थ विशेषज्ञ के पास जाता है। यदि वह भी काम नहीं करता है, तो यह मध्यस्थता न्यायालय में जाता है।
सूत्रों ने कहा, ‘पाकिस्तान ने पिछले दो मामलों में सीधे मध्यस्थता अदालत जाने का फैसला किया है।
सूत्रों ने इस्लामाबाद के ‘पीड़ित बयान’ को भी त्रुटिपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया। पाकिस्तान के पास सिंधु में 140 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी है। इसमें से 35 एमएएफ समुद्र में बर्बाद हो जाते हैं क्योंकि 1976 के बाद से कोई बड़ा बांध नहीं बनाया गया है। शेष 105 एमएएफ में से, एक और 45 एमएएफ रिसाव और खराब नहर नेटवर्क के कारण खो जाता है।
उन्होंने कहा, ‘तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब से भारत का हिस्सा सिर्फ 33 एमएएफ है। यह पाकिस्तान द्वारा बर्बाद किए जाने वाले पानी की मात्रा से भी कम है और समुद्र में बहने की अनुमति देता है।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के भीतर, पंजाब सिंध की तुलना में अधिक पानी खींचता है। जब तक इन आंतरिक मुद्दों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक भारत के खिलाफ एक नैरेटिव बनाने की कोशिशें नहीं टिक पाएंगी।
भारत जम्मू-कश्मीर में बगलिहार या सलाल बांधों के द्वार खोलकर पाकिस्तान में बाढ़ लाने की कोशिश भी नहीं कर रहा है। सूत्रों ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार गाद को बाहर निकाला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछले 65 वर्षों में प्रौद्योगिकी में काफी बदलाव आया है। जलवायु परिवर्तन ने पानी की मात्रा को बदल दिया है, और भारत नदियों के अपने किनारे बांधों के निर्माण में उत्तरोत्तर नई, अधिक समकालीन तकनीकों को पेश करेगा।



