Mood Kya Hai Kasganj: कासगंज में लोध और शाक्य समीकरण में कौन सी पार्टी मार रही बाजी?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं. यूपी Tak के विशेष कार्यक्रम ‘मूड क्या है’ में जब कासगंज जिले के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ चुनावी नब्ज टटोली गई तो जिले की तीनों विधानसभा सीटों (सदर, पटियाली और अमापुर) का दिलचस्प और चौंकाने वाला सियासी गणित सामने आया. पत्रकारों के अनुसार कासगंज की जनता में दो बार की सत्ता से जुड़ी एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर), जनप्रतिनिधियों से नाराजगी और अफसरों की हावी ब्यूरोक्रेसी को लेकर गहरा असंतोष है. जिले में सत्तारूढ़ दल के विधायकों के टिकट कटने की प्रबल चर्चाओं के बीच, विकास, रोजगार, स्वास्थ्य और ‘स्थानीय प्रत्याशी’ जैसे मुद्दे चुनावी नतीजे तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाने जा रहे हैं.

सदर विधानसभा

2017 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के पास रही कासगंज सदर विधानसभा सीट इस बार काफी रोचक मोड़ पर है. यह क्षेत्र लोधी बाहुल्य है. भाजपा और समाजवादी पार्टी-दोनों ही इस बड़े वोट बैंक को साधने के लिए इसी समाज के प्रत्याशी पर दांव लगाने की तैयारी में हैं. वरिष्ठ पत्रकार अजय झावर और अभिनव रस्तोगी के मुताबिक, तीर्थ नगरी सोरोंजी के विकास के लिए अयोध्या, मथुरा या काशी की तर्ज पर जिस कॉरिडोर की उम्मीद थी, वह अभी अधूरी है. इसके अलावा औद्योगिक विकास न होना यहां का सबसे बड़ा अनसुलझा मुद्दा है.

सपा का रुख

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा हाल ही में यहां किए गए बड़े ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सम्मेलन के बाद सपा की नजर इस सीट पर मजबूती से टिकी हुई है.

अमापुर विधानसभा

अमापुर विधानसभा सीट को लेकर पत्रकारों ने बड़ा दावा किया है. वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप माहेश्वरी के अनुसार, वर्तमान विधायक के खिलाफ जनता में भारी आक्रोश है. लोग विकास कार्यों के न होने और ब्यूरोक्रेसी के हावी होने से परेशान हैं. पत्रकारों का मानना है कि यदि सत्तारूढ़ दल ने अमापुर समेत जिले की अन्य सीटों पर प्रत्याशी नहीं बदले, तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है. चर्चाएं यह भी हैं कि एंटी-इन्कंबेंसी को खत्म करने के लिए पार्टी अपने मौजूदा विधायकों का टिकट काट सकती है.

पटियाली सीट

सपा के कब्जे वाली पटियाली विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी त्रिकोणीय और दिलचस्प दिख रहा है. पत्रकार गौरव तिवारी के अनुसार, यहां शाक्य और कश्यप समाज की बड़ी भूमिका है. भाजपा और सपा-दोनों ही दल इस जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर ही रणनीति बना रहे हैं. पटियाली की जनता में इस बात को लेकर बेहद नाराजगी है कि बाहर (एटा या अन्य इलाकों) से आए नेताओं को प्रत्याशी बना दिया जाता है. इस बार जनता की स्पष्ट मांग है कि प्रत्याशी ‘लोकल’ होना चाहिए. पत्रकारों का कहना है कि प्रशासन और पुलिस स्तर पर आम आदमी के काम नहीं हो पा रहे हैं जिससे आम जनता में मायूसी है.

कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और सोशल मीडिया रील्स का सच

चुनावी चर्चा के दौरान कासगंज के बुनियादी मुद्दों पर भी वरिष्ठ पत्रकार फहीम अख्तर और अन्य साथियों ने बेबाकी से बात रखी.

लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल: जहां कुछ लोगों का मानना है कि सुरक्षा व्यवस्था में सुधार हुआ है. वहीं पत्रकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि जमीनी स्तर पर छोटे-मोटे अपराध, लूट और अवैध कब्जे जारी हैं. सिर्फ “हाफ एनकाउंटर” दिखाकर गुंडागर्दी खत्म करने का दावा जमीनी हकीकत से परे है.
स्वास्थ्य व शिक्षा की बदहाली: जिला अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी है; करीब 35 डॉक्टरों के भरोसे पूरा अस्पताल चल रहा है. इसके अलावा स्कूलों के बंद होने, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे जनता के बीच तैर रहे हैं.

सोशल मीडिया बनाम धरातल: पत्रकारों का कहना है कि नेता सोशल मीडिया पर “जनता दरबार” और फोटो डालकर विकास का झूठा माहौल बना रहे हैं. अगर केवल सोशल मीडिया से चुनाव जीते जाते तो जमीनी रैलियों और मुद्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती.

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