Vrat Savitri Vrat: वट सावित्री व्रत पर वट वृक्ष की पूजा का धार्मिक महत्व जानें

Vat Savitri Vrat: सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए वट सावित्री व्रत रखती हैं। वट सावित्री व्रत रखने से शादी में खुशी मिलती है। सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है।
Vat Savitri Vrat: सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए वट सावित्री व्रत रखती हैं। वट सावित्री व्रत रखने से शादी में खुशी मिलती है। सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या को रखा जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से इस व्रत को करने वाली सुहागिन महिलाओं को अनंत सौभाग्य मिलता है। वट सावित्री पूजा के दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक सुहागन महिलाओं को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
सबसे पहले राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने रखा था ये व्रत
राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के लिए सबसे पहले वट सावित्री का व्रत किया था। तब से महिलाएं वट सावित्री व्रत अपने पति के मंगल कामना के लिए रखती हैं।
वट सावित्री व्रत की डेट: अमावस्या 26 मई को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी और 27 मई को सुबह 8 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। अमावस्या तिथि दोपहर होने पर वट सावित्री व्रत शास्त्रीय रूप से किया जाता है। इसलिए यह व्रत 26 मई को किया जाएगा।
वट वृक्ष की धार्मिक मान्यता:
शास्त्रों के अनुसार, बरगद के तने में भगवान विष्णु, उसके जड़ों में ब्रह्मा और उसके फूलों में शिव का स्थान है। इस वृक्ष की कई शाखाएं नीचे की ओर देवी सावित्री का रूप हैं। इसलिए इस वृक्ष की पूजा करने से भगवान का आशीर्वाद मिलता है और मन की इच्छा पूरी होती है। इस वृक्ष की पूजा संतान लाने के लिए की जाती है। मान्यता है कि देवी सावित्री ने ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को वट वृक्ष की छांव में अपने पति को पुन: जीवित किया था। यह दिन था जब वट वृक्ष की पूजा शुरू हुई। हिंदू धर्म में पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का प्रतीक है। उसी तरह, बरगद का पेड़ भगवान शिव का प्रतीक है। मान्यता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी। इस स्थान को प्रयाग में ऋषभदेव तपस्थली नाम से भी जाना जाता है।



